Friday, December 27, 2019

क्या इमरान को सऊदी अरब की आपत्ति का अंदाजा नहीं था?

मलेशिया में आयोजित कुआलालंपुर समिट से स्पष्ट हो गया है कि 'मुस्लिम वर्ल्ड' में मतभेद बहुत गहरा है.

इस समिट को लेकर इस्लामिक दुनिया का मतभेद खुलकर सतह पर आया. कुआलालंपुर समिट में पाकिस्तान का जो ढुलमुल रवैया रहा उससे यह भी स्पष्ट हो गया कि वो अपने दायरे से बाहर नहीं जा सकता है.

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को 19-20 दिसबंर को इस समिट में शामिल होने के लिए मलेशिया जाना था लेकिन उन्हें यह दौरा उसके ठीक दो दिन पहले सऊदी जाने के बाद रद्द करना पड़ा.

सऊदी अरब इस बात से ख़ुश नहीं था क्योंकि मलेशिया सऊदी के नेतृत्व वाले ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी ओआईसी को नया मंच बनाकर चुनौती देने की कोशिश कर रहा था.

यह समिट तब विवादों में घिर गया जब मलेशिया ने सऊदी अरब और उसके सहयोगी देशों को इसमें आमंत्रित करने से इनकार कर दिया. ईरान, तुर्की, क़तर और पाकिस्तान इसमें प्राथमिक तौर पर आमंत्रित किए गए थे. इसके अलावा दुनिया भर के 400 मुस्लिम विद्वानों को भी बुलाया गया था.

मलेशिया के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद पाकिस्तान और तुर्की से इस बात को लेकर चर्चा कर रहे थे कि इस्लामिक दुनिया की चुनौतियों की चर्चा इस समिट में हो. इमरान ख़ान ने न केवल इस समिट को समर्थन दिया था बल्कि उन्होंने इसमें आने के लिए भी हामी भरी थी.

पाकिस्तान के नीति निर्माताओं के बीच यह आम सोच है कि सऊदी के नेतृत्व वाले ओआईसी ने कश्मीर के मामले में भारत के ख़िलाफ़ बिल्कुल समर्थन नहीं दिया. दूसरी तरफ़ ईरान, तुर्की और मलेशिया ओआईसी को सीधे चुनौती देना चाहते हैं कि वो इस्लामिक दुनिया के सेंटिमेंट को समझने और मंच देने में नाकाम रहा है.

वहीं सऊदी अरब ओआईसी के ज़रिए मुस्लिम वर्ल्ड में राजनीतिक और राजनयिक प्रभाव क़ायम रखना चाहता है. अगर मलेशिया, तुर्की और ईरान की कोशिश सफल रही तो आने वाले महीनों में ओआईसी की प्रासंगिकता को गंभीर चुनौती मिलेगी.

सऊदी अरब में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद कहते हैं कि इमरान ख़ान ने पूरे मामले में अपरिपक्वता और अनुभवहीनता का परिचय दिया है. उन्होंने कहा, ''पाकिस्तान आज की तारीख़ में हर मोर्चे पर नाकाम साबित हो रहा है. इमरान ख़ान पर सऊदी अरब ने भयानक दबाव बढ़ा दिया है. पाकिस्तान में 20 फ़ीसदी से ज़्यादा शिया मुसलमानों की आबादी है और ईरान भी शिया मुल्क ही है. ईरान के साथ पाकिस्तान की सीमा लगती है. पाकिस्तान में जब नवाज़ शरीफ़ और ज़रदारी का शासन था तो ईरान से अच्छे संबंध बनाए रखने की कोशिश की गई. लेकिन इमरान ख़ान के आने के बाद सऊदी ने दबाव बढ़ा दिया कि वो उसके कहे बिना कुछ कर नहीं सकते हैं.''

तलमीज़ अहमद कहते हैं, ''कुआलालंपुर समिट ओआईसी को सीधी चुनौती थी. मलेशियाई पीएम महातिर मोहम्मद की कोशिश रही है कि कोई नया इस्लामिक संगठन बने जो सऊदी अरब की छाया से दूर रहे. ओआईसी पूरी तरह से अप्रभावी हो गया है. यह सऊदी के लालच पूरा करने का ज़रिया है. इसका इस्तेमाल सबसे ज़्यादा ईरान के ख़िलाफ़ होता है. महातिर की कोशिश है कि वो ईरान, तुर्की और क़तर को लेकर कोई नया संगठन खड़ा करें, जिसमें पाकिस्तान भी शामिल हो. हालांकि ऐसा हो नहीं पाया. इमरान ख़ान कुछ भी संभाल नहीं पा रहे हैं और उन्होंने मलेशिया दौरा रद्द कर बड़ी भूल की है.''

कहा जा रहा है कि मलेशिया, तुर्की, ईरान और पाकिस्तान इस समिट में जम्मू-कश्मीर पर भी चर्चा करने वाले थे. मलेशिया और तुर्की कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किए जाने के बाद संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में खुलकर भारत के ख़िलाफ़ बोले भी थे. सऊदी को लेकर पाकिस्तान के भीतर कहा जा रहा है कि भारत के साथ उसके अपने हित जुड़े हैं इसलिए कश्मीर मामले में वो ख़ुद बोल नहीं रहा.

कश्मीर मामले में सऊदी अरब और उसके सहयोगी देशों ने पाकिस्तान का समर्थन नहीं किया. पाकिस्तान में इसे लेकर नाराज़गी भी बढ़ी और विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी को सामने आकर कहना पड़ा कि दोनों देशों के अपने-अपने हित हैं इसलिए कश्मीर उनकी प्राथमिकता में नहीं है. सऊदी ने कश्मीर को लेकर चिंता जताई लेकिन संयुक्त अरब अमीरात ने इसे भारत का आंतरिक मामला क़रार दिया.

भारत ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किया तो पाकिस्तान, तुर्की, मलेशिया और ईरान खुलकर सामने आए. दूसरी तरफ़ ओआईसी कश्मीर पर भारत को लेकर उदार रहा. इसके उलट सऊदी ने भारत को ओआईसी के मंच पर लाया. ओआईसी को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या वो मुस्लिम वर्ल्ड की समस्याओं और चुनौतियों को गंभीरता से देख रहा है या कुछ देश इसे अपने हित के लिए हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं?

पिछले कुछ सालों में ओआईसी यमन में हूती विद्रोहियों की भूमिका की आलोचना करते हुए कह चुका है कि यह क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए ख़तरा है. ओआईसी की यह टिप्पणी अप्रत्यक्ष रूप से सीधे ईरान के ख़िलाफ़ थी. ईरान यमन में हूती विद्रोहियों से सहानुभूति रखता है. पाकिस्तान के भीतर कहा जा रहा है कि इमरान ख़ान का सऊदी के दबाव में आकर मलेशिया दौरा रद्द करना उनकी रणनीतिक ग़लती है.

सऊदी इस समिट में पाकिस्तान को नहीं देखना चाहता था. जिस समिट में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने जाने की घोषणा की थी उसमें वो अपना एक मंत्री तक नहीं भेज पाया. विशेषज्ञों का कहना है कि इससे एक बार फिर से साबित हुआ कि पाकिस्तान की विदेश नीति में सऊदी अरब का सबसे बड़ा प्रभाव है.

पाकिस्तान के प्रमुख अख़बार डॉन ने 18 दिसंबर को अपनी संपादकीय में भी कहा कि इमरान ख़ान का मलेशिया दौरा रद्द करने उनकी बड़ी रणनीतिक चूक है. इस संपादकीय में कहा गया कि इमरान ख़ान ने राजनयिक मोर्चे पर अपरिपक्वता दिखाई है. अख़बार ने लिखा है कि क्या इमरान ख़ान को इस समिट में जाने की घोषणा करते वक़्त सऊदी अरब की आपत्ति का अंदाज़ा नहीं था?

कहा जा रहा है कि पाकिस्तान इसकी भारी क़ीमत चुकाएगा. मलेशिया दौरा रद्द करने के बाद यह बात ज़ोर देकर कही जा रही है कि पाकिस्तान की विदेश नीति में अब भी बाहरी दबाव की भूमिका सबसे प्रभावी है. इसके साथ ही इस बात की भी पुष्टि हो गई है कि ईरान, मलेशिया और तुर्की कश्मीर पर उसके साथ हैं लेकिन यह तय नहीं है कि पाकिस्तान भी उनके साथ रहेगा.

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या पाकिस्तान स्वतंत्र रूप से ईरान और तुर्की से बिना सऊदी के प्रभाव के बात कर सकता है? अभी पाकिस्तान सऊदी और ईरान में विवादों को सुलझाने की कोशिश कर रहा था. मलेशिया दौरा सऊदी के दवाब में रद्द करने के बाद अब उसकी मध्यस्थता की क्षमता पर भी सवाल उठ रहे हैं.

पाकिस्तान के समिट में नहीं आने पर तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोवान ने कहा कि वो सऊदी के दवाब और धमकी के कारण नहीं आया. मलेशिया के प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से कहा गया कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने फ़ोन कर पीएम महातिर मोहम्मद से खेद जताया है.

Wednesday, December 11, 2019

贸易战背后的认识鸿沟:中国崛起和美国吃亏论

美中贸易战持续了一年多后,新疆和香港问题又为达成协议的前景增添了不确定,此外美中在利益认识上也存在巨大鸿沟。

中美贸易战持续了17个月后仍无望达成“第一阶段”协议,特朗普的支持者,美国亿万富翁肯·朗格尼(Ken Langone)说,现在是中国补偿美国的时候了。他说在过去40年中美国一直在帮助中国。

朗格尼是全球最大的家具建材零售家商家得宝(The Home Depot)的创办人,他在全国广播公司商业频道(CNBC)节目中说,“不要忘了开始的情况,我们尽一切努力帮助一个巨大而且重要的国家恢复其能力。现在是他们该偿还的时候了。”

虽然特朗普推动对华强硬是否在华盛顿形成共识仍然是个有争议的话题,但是特朗普的有关言论却在政策舆论圈经常被重复,其中就有美国帮助中国,中国利用美国的说法。中国媒体将此总结为“美国吃亏论”。

美国副总统彭斯10月初在哈德逊研究所的演说中回顾中国在美国帮助下从孤立走向改革开放的历史,他也重复了“重建中国”的话,在中国媒体引起激烈反弹。彭斯说,“过去17年,中国GDP增长9倍,变成世界第二大经济体,这很大程度上得益于美国对中国的投资。”

当然彭斯是在重复特朗普自总统竞选以来就一直重复的主题:美国重建了中国。在9月底特朗普说,在过去25年当中“我们重建了中国”。

早在2016年特朗普在总统竞选中就对《纽约时报》记者说, “你知道,是我们重建了中国。他们用从美国拿走的钱重建了中国。”

2018年特朗普对全美独立企业联合会讲话说,“...中国每年从我们国家拿走5000亿美元用于重建中国。我总是在说‘是我们重建了中国’…”

特朗普经常说北京占了华盛顿便宜,并且发誓要通过贸易协议和增加关税创造公平竞争的条件。周二(12月3日),特朗普又对记者说,多年来“中国占尽美国的好处”。

坚决拥护特朗普对华强硬的朗格尼说,总统的想法完全正确,如果有什么错的话,那就是美国政府应该在15-20年前就应该处理这个问题。

不过美中对经贸利益看法上的分歧,在经贸关系上对中国施压,并非从特朗普开始。早在小布什担任总统的时候美国就开始警告中国要遵守世贸组织的规则,并且对中国出口的某些产品施加限制。

2005年当时还担任商务部长的薄熙来曾对欧盟官员说,中国向欧洲出口8亿件衬衫,才能换回一架空中客车飞机,暗示中国并不情愿接受这种不平等的贸易现实。

中国经济学家,曾任人大常委会副委员长的成思危说,“中国开到美国的船都是满的,开回来时都是空的”,以此说明中国对美出口低附加值的实物产品,美国向中国的出口高附加值的金融、法律和软件等服务产品。